स्वामी सत्यानंद सरस्वती का जीवन परिचय | Swami Satyananda Saraswati ka Jivan Parichay

परमहंस स्वामी सत्यानंद सरस्वती जन्म से ही फकीरी थे और एकांतवास में रहे थे । इनका जन्म 24 दिसंबर 1923 ईसवी में अल्मोड़ा के निकट हिमालय की तराही में स्थित एक गांव में हुआ था। यह उत्तराखंड में पैदा हुए और गरीब किसान परिवार में जन्मे थे।

इनमें बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा थी। भैरवी नाम के एक तांत्रिक से इन्होंने बहुत सी शिक्षा ग्रहण की। 6 वर्ष की उम्र में इन्हें प्रथम आध्यात्मिक अनुभूति हुई। हिमालय के उच्च क्षेत्रों की ओर यात्रा करने वाले उन मनीषियों और साधुओं का आशीर्वाद प्राप्त करते करते जाया करते थे, जो उनके घर के रास्ते से गुजरते थे।

उन मनुष्यों और साधुओं ने उन्हें अनुभवों की ऊंचाई तक पहुंचने के लिए प्रेरित किया और उन में तीव्र वैराग्य भाव उत्पन्न हुआ। इतनी कम अवस्था में ऐसा होना एक असाधारण बात थी। उन्होंने 19 वर्ष की आयु में अपना घर परिवार छोड़ दिया था और 2 वर्ष तक भटकने के बाद भी इनकी शंका पूरी नहीं हुई।

वह गुरु की खोज में निकल पड़े तो कुछ समय बाद वे ऋषिकेश पहुंचे। वही उनकी मुलाकात स्वामी शिवानंद सरस्वती जी से हुयी। उन्होंने सोचा यही मेरी शंका का समाधान कर सकते हैं वह उन्हें अपना गुरु मानते थे। वह जिज्ञासु भाव के साथ आए थे। यह गुरु आश्रम में 12 वर्ष तक रहे वहां वे सदैव कर्म योग में रत रहते थे।

इससे स्वामी शिवानंद जी की यह धारणा ही बन गई थी कि वह अकेले चार व्यक्तियों का कार्य करते हैं। स्वामी जी प्रातः काल से लेकर देर रात्रि तक कर्म योग में व्यस्त रहते थे। आश्रम की सफाई से लेकर व्यवस्था तक के सभी प्रकार के कार्य का संपादन करते थे। गुरु सेवा से उन्हें अत्यंत अनुराग था। उसमें उन्हें अपार आनंद मिलता था।

स्वामी शिवानंद जी ने बहुमुखी प्रतिभाशाली की संज्ञा उन्हें दी। स्वामी सत्यानंद जी का यह ज्ञान आश्रम में दिए जाने वाले उपदेश सोया पुस्तकों के अध्ययन पर आधारित था। उन्होंने गुरु के इस निर्देश का आस्था पूर्वक पालन किया। परिश्रम करो, जिसेसे तुम पवित्र हो जाओगे।

आत्मज्ञान के लिए तुम्हे ही प्रयास ही करना है। आत्मज्ञान स्वयं तुम्हारे अंदर से प्रकट होगा और अंततः ऐसा ही हुआ। आध्यात्मिक जीवन के अनेक रहस्य उनके सामने प्रकट हुए। इस प्रबोधन के फलस्वरूप तब ही योग तंत्र कुंडलिनी वेदांत एवं सांख्यिकी महान विशेषज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हो गए।

स्वामी सत्यानंद जी 12 वर्ष तक गुरु के सानिध्य में रहे। तदोपरांत उनका परिव्राजक (संन्यासी) जीवन प्रारंभ हुआ । एक परिव्राजक के रूप में उन्होंने 8 वर्ष तक संपूर्ण भारत, अफगानिस्तान, नेपाल एवं श्रीलंका का भ्रमण किया। इस अवधि में उन्होंने अनेक रोगियों एवं संतों से मिलने का शुभ अवसर प्राप्त किया। समय-समय पर उन्हें एकांतवास में भी जाना पड़ता था।

इसका उपयोग उन्होंने यौगिक तकनीकों को प्रतिपादित एवं परिष्कृत करने में किया। ताकि मानवता को कष्ट से मुक्ति मिल सके। सन 1963 में उनके सामने उनका लक्ष्य स्पष्ट हो गया तथा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय योग मित्र मंडल की स्थापना की। क्योंकि अपने मुंगेर प्रभास की अवधि में उन्हें लक्ष्य की अनुभूति हुई ।

अतः वह वही गंगा के किनारे निवास करने लगे। आध्यात्मिक मार्ग पर लोगों का पथ प्रदर्शन करने हेतु उन्होंने सन 1964 में मुंगेर में ही बिहार योग विद्यालय की स्थापना की। शीघ्र ही संपूर्ण भारत एवं विदेशों से जिज्ञासु एवं साधक इस विद्यालय में आने लगे। स्वामी सत्यानंद जी की शिक्षा तेजी से संपूर्ण विश्व में फैलने लगी।

इन्होंने 1968 में न्यूजीलैंड में विदेश दौरा किया। जापान ऑस्ट्रेलिया में उनके अनुयाई थे। स्वामी निरंजनानंद को वह कार्यभार सौंप देते हैं, उनका उद्देश्य सभी जातियों मतों, धर्म एवं राष्ट्रीयता के लिए लोगों के बीच यौगिक अभ्यासों को लोकप्रिय बनाना था। उसके बाद स्वामी सत्यानंद सरस्वती विश्व विख्यात हो गए।

इस दौरान स्वामी जी ने योग विद्या पर आधारित लगभग 80 ग्रंथों की रचना की जिसमें योग तंत्र एवं क्रिया तथा आसन प्राणायाम मुद्रा बंद आदि काफी चर्चित है स्वामी जी ने योग निद्रा पर कई वैज्ञानिक अध्ययन करें इसे पुनर्स्थापित किया सन 1983 मैं स्वामी जी ने स्वामी निरंजनानंद सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी तथा बिहार योग एवं उससे संबंधित योग केंद्रों का अध्यक्ष नियुक्त किया।

सन 1984 में इन्होंने शिवानंद मठ की स्थापना की उसी वर्ष स्वामी जी ने योगिक तकनीकों पर वैज्ञानिक शोध करने के उद्देश्य से योग शोध संस्थान की स्थापना की किंतु पर बिहार योग विद्यालय से समन्वय रखते हुए कार्य करती है क्योंकि यह दोनों ही स्वतंत्र संस्थाएं हैं।

सन 1988 में स्वामी सत्यानंद जी ने मुंगेर छोड़कर एक सन्यासी के रूप में भारत के सिद्ध तीर्थ उनकी तीर्थ यात्रा प्रारंभ की, तदोपरांत उन्होंने क्षेत्र संन्यास ले लिया एवं अपने संस्थाओं तथा पूर्व की सारी व्यवस्थाओं का परित्याग कर दिया।

अब स्वामी जी ने एक परमहंस सन्यासी की जीवन पद्धति अपना ली और अब वे सिर्फ अपने अनुयायियों एवं संस्थाओं के लिए ही नहीं बल्कि एक विश्वव्यापी दृष्टिकोण से साधना रथ हो गए इस प्रकार देवघर के पास रखिया नामक स्थान पर एकांत साधना के उद्देश्य से डेरा जमाया।

लेकिन इनके शिष्य अनुयाई ने यहां भी इन्हें घेर लिया और आसपास की सारी जमीन खरीद कर दान कर दी। स्वामी जी पहले ही परमहंस की उपाधि प्राप्त कर चुके थे। अतः आने वाले शिष्यों भक्तों के दान को आसपास के गरीब किसानों एवं श्रद्धालुओं को दान कर देते। यही उन्होंने पंचाग्नि जैसी कठोर साधना पूर्ण की, तत्पश्चात कठोर व्रत त्याग कर भक्ति योग को प्रधानता दी तथा वर्ष 2009 में इन्होंने अपने मुख्य दो शिष्यों को बताकर महासमाधि ले ली।

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