वातसार

1. (क) वातसार अन्तधौति

विधि – किसी सुविधाजनक आसन में  बैठकर, मुंह खोलकर कीवे की चोंच जैसा आकार बनाइये । नाक से श्वास छोडिये॰, मुँह से वायु को धीरे- धीरे पीकर उदर में भरने का प्रयत्न कीजिए। यह काकी मुद्रा कहलाती । यह क्रिया कठिन नहीं है, परन्तु इसमें अभ्यास की जरूरत है । वायु से ही पेट को जितना भर सकते हैं, भरते जाइये। जब पेट पूरी तरह भर जाये तो शरीर को ढीला छोड दें और वायु को उदर मेँ कुछ समय के लिए घुमायेँ। उसके बाद धीरे-घीरे रेचक के माध्यम से उस वायु को बाहर निकाल दें।

ऊपर जो वीधि बतलायी गयी है, उसके साथ और  कुछ भी जानना आवश्यक है । जैसे, आसन क्या होना चाहिए । इस अभ्यास को करने के लिए पदमासन, सुखासन् सिद्धासन, सिद्धयोनी आसन,  अर्थात् ध्यान के जो आसन हैँ, उनमें बैठना चाहिए। उसके बाद हाथो  को घुटनों के ऊपर रखना है । रीढ़ को हड्डी को सीधा रखना है ।

इस अभ्यास को खड़े होकर नहीं करते । इसके पीछे कारण यह है कि जब हम जमीन पर एक आसन मे बैठते हैं, तो यह शारीरिक  स्थिति आँतों को अवरुद्ध  कर देती हैं । जब हम खड़े होते हैं, तब आंते निर्बाध हो जाती हैं । खड़े होकर अभ्यास करने से वायु आन्ठ में प्रवेश का सक्ली है, लेकिन बैठकर अभ्यास करने से, जव आतें७ अवरुद्ध हो जाती हैँ, स्कूवित’ हो जाती हैं, उस समय वायु अति’ में प्रवेश नहीं करेगी, केवल पेट मे’ रहेगी। इसलिए इसका अभ्यास ध्यान के किसी आसन में बैठकर कस्ना चाहिए। .

इसके बाद ओंठों को गोल कर कीवे की चोच  की तरह बना लेना और जिस प्रकार पानी पीते हैं, ठीक उसी प्रकार पानी के बदले हवा को पीना है। शीतली प्राणायाम हो या कोई और प्राणायाम हो, उनके अभ्यास के समय हवा  फेफडों में जाती है, लेकिन इसमें हवा को फेफडों में नहीं जाने देना है । यही इसका अभ्यास है । हवा को सीधे पेट में ले जाना है, जैसे पानी पीते हैँ। जब पानी पीते हैं तब गले की एक प्रक्रिया होती है गला ऊपर-नीचे होता है और वायु नली अपने आप बन्द हो जाती हैं।

यहॉ पहले सीखना है वायु नली को स्वेच्छा से बन्द् करना, और दूसरी चीज सीखनी है हवा को पेट मे  लेना । जब हवा को पेट मे  लेते हैं,  उसे केवल एक- दो मिनट ही अन्दर रखना है,  अधिक नहीं । अर्थात् श्वास चलती रहेगी । यहॉ कुम्भक के बारे में नहीं कहा गया है । श्वास चलती रहती है, क्योकिं यह फेफडों से चल रही है। पेट के अन्दर हवा को रखना है।

अब इसमे  एक ऐसी प्रक्रिया होती है जैसो हम पानी पीने के समय करते है । आप पानी को मुँह मे  भर लें, तो भी आप नाक से श्वास लेते रहते हैं लेकिन इस समय गले की स्थिति अलग हो जाती है । पानी को अत्र नलिका में  प्रवेश नहीं करने देना है । गरारे करते हैं, उस समय भी गले का वह भाग ऊपर की ओर आता है

ओंर पूरे पानी को भीतर प्रविष्ट नहीं होने देता। वैसे उसमे  तो अदर से वायु का भी दबाव रहता है, लेकिन इसमें वह दबाव नहीं रहता। गर्दन की मांसपेशियों के ऊपर नियन्त्रण होना चाहिए । एक-दो मिनट रखने के बाद वायु को धीरे-धीरे निकालते हैं, डकार के रूप मे । यदि किसी का पेट वास्तव में खराब हो,  तो वह वायु दुर्गन्ध के साथ निकलती है,  लेकिन बहुत-ही कम लोगों में यह देखा  जाता है ।

वायु को जल्दी-जल्दी नहीं पीना है । उसे भीतर ले जाने की गति सामान्य होनी चाहिए। मुँह को भी ज्यादा फुलाना नहीं है । जब हम मुंह खोलते हैं, उस समय मुँह के भीतर जितनी वायु जाती है, उतनी ही वायु पेट के अन्दर जायेगी। तत्पश्चात् हम और वायु अन्दर ले जायेगे, फिर और । सामान्य श्वास की गति से आप इसका अनुमान लगा सकते हैं। यह गटागट पानी पीने के समान नहीं है।

उदर संचालन – सामान्यत: वायु को पेट में रोक कर  वहिसार (अग्निसार) का अभ्यास क्रिया जाता है, ताकि वायु उदर में घूमे और घूम कर  बाहर निकले। इस प्रकार अग्निसार क्रिया या नोली क्रिया, दोनों में से किसी एक अभ्यास को कर सकते है ।

वातसार अन्तधौति की उपयोगिता

साधारणत: डकार लेने के बाद हलकेपन का अनुभव होता है । यह एक बहुत साधारण क्रिया है, जिसे आप जाने-अनजाने करते ही हैं । जब हम भोजन करते हैं तो भोजन निगलते समय कुछ हवा भी निगल जाते हैं। यह हवा पेट में जाती ‘है । कभी-कभी यह वायु गुदा मार्ग से निकलती है और अधिकतर डकार के रूप में पुन: मुंह से निकल आती है। वातसार धौति इसी प्राकृतिक क्रिया पर आधारित है, परन्तु इसमे  वायु को भोजन कें समय न निगलकर श्वाश अन्दर लेते समय सीधे पेट में  निगलते है । आँक्सीजन निगलने से पाचन क्रिया सक्रिय होती है।

वातसार अन्तधौति के लिए अभ्यास का समय एवं आवृति  

वातसार धौति का अभ्यास आप चाहे जितनी बार कर सकते हैं,  परन्तु दोनों समय भोजन के पूर्व करना चाहिए। दिन में किसी भी समय कर सकत्ते हैं, परन्तु भोजन के तुरन्त बाद नहीं करना चाहिए। तैरते समय भी वातसार धौति का अभ्यास क्रिया जा सकता है।

वातसार परं गोप्यं देह निर्मलकारकम् । सवं रौगक्षफ्फरं देहानलविवर्द्धकम् ।।।6।।  घेरंड संहिता

अर्थ – वातसार अत्यन्त गुप्त क्रिया है । यह शरीर मे’ निर्मलता लाने का कारण है। यह सभी रोगों को नष्ट करती है। जठराग्नि को तीव्र बनाती है ।।16।।

ब्याख्या – वातसार एक गुप्त क्रिया है। यह गुप्त क्रिया क्यों है?  वैसे देखा जाये तो योग की सभी क्रियाओ  को गुप्त क्रिया के रूप मे देखा जाता है।

इसके तीन कारण हैँ। एक तो योग के व्यावहारिक अभ्यास की जानकारी किसी को रहती नही । केवल पुस्तक पढ़ कर अभ्यास करने से पता नहीं कब क्या परिणाम हो जाये। बहुत-से लोग पुस्तक पढकर कुण्डलिनी जगाने के चक्कर मे  पड़ जाते हैं। कुछ-कुछ अभ्यास भी कर लेते हैं। लेकिन जब कुण्डलिनी जगने के पहले थोडी कुल बुलाने लगती है, तो वे लोग पागल हो जाते हैं ।

वातसार अन्तधौति में क्या क्या सावधानियाँ रखे-

इस अभ्यास के नियम तो सामान्य ही हैं । जिस प्रकार से आसनों का नियम होता है, खाली पेट अभ्यास करना, ठीक उसी प्रकार धौति में  भी इस नियम का और अधिक कठोरता से पालन क्रिया जाता है, क्योकि धौति का प्रयोजन ही है बाहर निकालना । पेट में यदि अत्र रहेगा भी, तो बाहर निकल जायेगा । इसलिए खाली पेट अभ्यास का जो नियम है, वह आसन, प्राणायाम, षटकर्म  और योग के सभी प्रकार के शारीरिक अभ्यासों के लिए प्रभावी होता है । इसको हमेशा स्मरण रखना चाहिए। इस अभ्यास को कम-से-कम दो बार,  अधिक-से-अधिक पांच बार करना चाहिए इससे अधिक नहीं । इसका अभ्यास प्रतिदिन क्रिया जा सकता है ।

व्यावहारिक ज्ञान और मार्गदर्शन के बिना गलत अभ्यास से हानि होने की सम्भावना रहती है । यह भी कह सकते  हैं कि हर व्यक्ति योग की उच्च क्रियाओं का अधिकारी नहीं बन सकता,  क्योकि शारीरिक बनावट भी अनुकूल नहीं होती,  या उम्र के कारण शारीरिक क्षमता क्षीण हो जाती है। अस्सी साल हैं वृद्ध व्यक्ति को ये सब अभ्यास थोड़े ही कराये जायेगे। उसे तो पवनमुक्तासन, नाडी. शोधन प्राणायाम, योगनिद्रा जैसे हलके अभ्यास कराये जायेगे,  षटकर्म  तो नहीं करायेगे। इसलिए सभी योगाभ्यास हर एक व्यक्ति के अनुरूप नहीं हो सकते । उनकी शारीरिक क्षमता, अवस्था और उद्देश्य इत्यादि को देखना पडता है ।

 बहुत बार दिल के मरीजों को यदि दिल में दर्द रहता है,  तो उसका कारण वायु होती है। उसका अर्थ यह नहीं कि दिल का दौरा पड़ रहा है । जब हमारे शरीर में वायु का प्रकोप बढता. है,  तब वह अन्दर-ही-अन्दर ऊपर की ओर फैलती है । जब भीतर में दबाव पडता. है तो हदय मेँ हलका दर्द उत्पन्न होता है । बहुत-से लोग घबरा जाते हैं कि कहीं मुझे दिल का दौरा तो नहीं पड़ रहा है। जब वायु डकार के रूप मेँ बाहर निकलती है,  तो पुन: एक क्षणिक हलका दबाव उत्पन्न होता है । वह भ्रान्ति कभी कभी मन में इतनी घबराहट पैदा कर देती है कि फिर से दर्द शुरू हो जाता है । इस परिस्थिति मे’ यह अभ्यास बहुत-ही उपयोगी है,  लेकिन ऐसे व्यक्तियो’ के लिए नहीं जिन्हें दो -तीन साल पूर्व दिल का दौरा पड़ा हो । जिन लोगों ने हदय-शल्य-चिकित्त्सा करवायी है,  उनके लिए भी यह अभ्यास लाभदायक सिद्ध नहीं होगा। अन्य सभी व्यक्ति इस अभ्यास को कर सकते हैं।

वातसार अन्तधौति के लाभ

देहनिर्मलकारकम्’ – वातसार क्रिया शरीर को निर्मल करती है । निर्मल, का अर्थ होता है शुद्ध पवित्र । यदि शरीर शुद्ध हो तो यह कहना आवश्यक नहीं की स्वस्थ्य-लाभ अवश्य होगा । मनुष्यों में अधिकतर बीमारियाँ पेट से शुरू होतीं हैं। पेट में वात, पित्त इत्यादि की गड़बड़ी के कारण होती हैं । यदि इनमे  से एक कारण को भी ठीक कर सकें, उसे नियन्त्रण में ला सकें, तो उसका प्रभाव दूसरे प्रत्ययों पर भी पडेगा।

‘सर्वरोगक्षयकरं देहानलविवर्धकम’- सभी रोगो  का क्षय करती और पेट मेँ होने वाली रासायनिक क्रियाओं को बढाकर  ज़ठराग्नि की तीव्रता को बढाती  है I  पेट मे  उत्पन दूषित गैस को बाहर निकालती है । पित्त की बाढ़ को रोकती है l पेट एव  छाती में अम्ल से होने वाली जलन मिटाती है । यदि पाचन-प्रक्रिया ठीक हो जाये,  पाचक द्रव सही मात्रा मे  निकलने लगे, मल का निष्कासन भी समय पर होता रहे एवं  पेट वायु –विकार रहित हो तो पेट के अनेक रोग, जैसे – कब्ज, कीटाणुओ से उत्पन्न रोग,  पेचिश, पेट पें फोड़े,  हर्निया, अल्सर, मोटापा इत्यादि दूर हो जाते है।

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