जल नेति क्रिया की विधि और लाभ

जल नेति : –

यह जल नेती क्रिया नासिका से की जाने वाली क्रिया है, इसके लिए टोंटी वाले लोटे का प्रयोग किया जाता है, इसकी टोंटी विशेष प्रकार की बनी होती है ताकि वह नासिका छिद्र में भली भांति जम जाए और उसका जल उस नासिका छिद्र से बाहर न निकलें। इससे नाक, कान, गले, आँखों फेफड़ो, सांसो का उपचार किया जाता है ।  

जल नेति विधि

शरीर के तापमान के बराबर ताप वाले पानी को लोटे में भरकर, उसमें स्वाद के लिए थोड़ा नमक मिलाया जाता है। पानी हल्का नमकीन होना चाहिए, ध्यान रहे कि सारा नमक जल में घुल जाए साधारण जल के बदले नमकीन जल नाक में डालने का विशेष कारण है। नमकीन जल में रस आकर्षण दबाव साधारण जल से अधिक होता है अतः कोमल रक्तवाहिनियों और झिलियो में नमकीन जल सरलता से प्रवेश नहीं कर पाता, जितना कि साधारण जल।

लोटे की पहली को एक हाथ से पकड़े, फिर से लौटे की टोंटी को एक नासिका छिद्र में घुसायें। टोंटी का मुंह नाकद्वार में ठीक से बैठ जाएं, जिससे जल बाहर की ओर न गिर सके।

सिर को एक और झुकाकर पानी को पानी को उसके ही दबाव से नासिका के अंदर बहने दे। मुंह को खोलकर रखें पानी एक नासिका से प्रवेश करके दूसरी से बाहर निकलता है, इस क्रिया के समय श्वसन क्रिया मुंह से होती रहती है। नेति करते समय नाक से श्वास कभी नहीं लेनी चाहिए।

कभी-कभी मुंह में थोड़ा पानी चला भी जाए तो कोई बात नहीं। यदि सही विधि से इस क्रिया को करेंगे तो ऐसा कभी नहीं होगा। 10-20 सेकंड तक पानी को नासिका नली से बहने दे। अब नेति लौटे की टोंटी को नाक से निकाल कर एक नाक बंद कर नाक को जोर से छिड़के, जिससे सारा जल बाहर निकल जाएं। अधिक जोर से नहीं छिड़कें, अन्यथा नासिक नली में चोट पड़ने पर खून निकल सकता है। उसके बाद दूसरी नाक को बंद कर नाक छिड़के। अब दूसरी नाक से इस नेति क्रिया को 10 -20 सेकण्ड तक करे।

 नाक सुखाना-

जल नेति क्रिया के बाद नाक की नलियों को सुखा देना और उसमें पड़े हुए संपूर्ण जल को निष्काषित कर देना अत्यावश्यक है। सीधे खड़े हो जाएं आगे झुके, जिससे धड़ सीधा पृथ्वी के समानांतर हो जाए। अंगूठे से एक नाक को उसकी बगल से दबाकर बन्द करें। अब जोर से जल्दी-जल्दी श्वास लें और छोडे । श्वास छोडने, की इस क्रिया मे नाक से बचे हुए जल को निकालने पर ही अधिक ध्यान दे ।

उसके बाद इस क्रिया को दूसरी नाक से दुहरायें । इस साधारण से अभ्यास से नाक में बचा-खुचा जल निष्कासित हो जाएगा। यदि ऐसा लगे कि अभी कुछ जल भीत्तर में बाकी है, तो पुन: जोर से उपर्युक्त क्रिया करे।  जब तक नाक से सारा जल पूरी तरह निकल न जाए।

आवर्ती एव समय

इस क्रिया को प्रतिदिन किया जा सकता है । इसके लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातः काल है । आवश्यक हो तो इसे अन्य समय में भी किया जा  सकता है । नासिका सम्बन्धी बीमारी होने पर इसे दिन में एक से अधिक बार भी किया जाता है।

जल नेति करते समय सावधानियाँ

जिन्हे नाक से खून आने की पुरानी बीमारी हो, उन्हे  किसी सुयोग्य और जानकार व्यक्ति के निर्देशन के बिना नेति क्रिया नहीं करनी चाहिए। नाक में जल डालते समय इस बात का ध्यान रखे  कि जल अधिक गर्म न हो। जल को नाक से सुखाने के समय नाक को बहूत्त जोर से नहीं छिडके। क्रिया से पहले यह देख लेना आवश्यक है कि नमक अच्छी तरह घुला है या नहीं।

यदि एक नाक से पानी डालकर दूसरी से बाहर निकालने में  कठिनाई हो तो इसका अर्थ है कि नासिका की विशेष बनावट के कारण रुकावट है । ऐसो स्थिति में सुयोग्य और जानकार व्यक्ति से अवश्य सलाह लेनी चाहिए। यदि पहले-पहले नाक से पानी डालने से थोड्री-बहुत जलन होती हो तो इसके लिए चिन्ता नहीं करनी चाहिए। धीरे-धीरे आदत पड़ने पर जलन होनी बन्द हो जाएगीI

 जल नेति के लाभ (Jal Neti Benefits)

जब कुनकुना पानी नासिका छिद्रों से होकर जाता है, तब इसका पहला प्रभाव पडता है सायनस ग्रन्थियों पर । सायनस ग्रंथिया नाक के भीतर श्लेष्मा उत्पत्र करती हैं तथा नासिका के भीतर वायु को शरीर के अनुकूल बनाकर ही उसे फेफडों के भीतर जाने देती हैं। यदि वायु गरम हो तो उसे शरीर के तापमान के अनुकूल बनाकर ही भीतर जाने देती हैं ।

यह एक प्रकार का छनित्र है और वायु इसके छिद्रों से होकर पार जाती हैं । जब कभी नाक भर जाती है तब हम श्वास नहीं ले पाते, क्योकिं  इस छनित्र के सभी छिद्र बन्द हो जाते ,हैं साथ-ही-साथ वायु जब इस छिद्र से होकर जाती है तब शरीर के तापमान के अनुसार उस बाह्य वायु का तापमान घटता या बढ़ता नहीं है ।

‘नेति क्रिया’ इसका शास्रीय नाम है। इसका आधुनिक, वैज्ञानिक नाम है ई एन टी. केयर है I कान, नाक और गले से सम्बद्ध क्रिया । इस क्रिया से गले की भी सफाई होती है, अर्थात् वाणी से सम्बन्धित्त जो नाडियां हैं, वे भी उत्तेजित एवं प्रभावित होती हैं। सर्दी-जुकाम के उपचार के लिए इससे सहज और कोई आसन उपाय नहीं है I

नेति क्रिया के द्वारा नाक के श्लेष्मा में फंसे हुए सभी धुल कणों  को बाहर निकाला जाता है । यदि सर्दी नहीं भी हुई तो भी नियमित रूप से करने से नाक की नली की सफाई होते रहने के कारण उसमे अधिकाधिक दक्षता बनी रहती  है और इस प्रकार शरीर को स्वस्थ रखने में पूर्ण सहायता मिलती है । नाक बंद रहने पर मुंह से श्वास लेने से भीतर जाने वाली वायु का शुद्धिकरण ठीक से नहीं हो पाता तथा अनेक प्रकार के कीटाणु सीधे फेफ़द फेफड़ों मे प्रवेश का जाते है और शरीर को कमजोर बना देते हैं।

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यह क्रिया नाक  की स्वच्छता तथा दृष्टि को दुरक्षित्त रखने के लिए सर्वोत्तम क्रिया है । जल नेति द्वारा अन्दर जाने वाला जल दृष्टि सम्बन्धित अंगो को प्रभावित करता है । आँखों की ओर आने वाली रक्त वांहिनियों की गति बढ़ जाती है, जिससे उन अंगो को अधिक रक्त प्राप्त होता है । इससे आँखों की गन्दगी को बाहर फेंकने में सहायता प्राप्त होती है। यह पाया गया है कि आँखों  से सम्बन्धित रोग मात्र इसी क्रिया से दूर हो जाते हैं । आँखों के  दोष प्रारम्भिक अवस्था में हो, तो वह नेति क्रिया के अभ्यास से दुर हो जाता है ।

नेति के इस प्रकार के परिणाम प्राय: देखे गये हैं। साथ-ही लोगो को  अपने-अपने अनुभव होते है । किसी का सरदर्द ठीक हो जाता है, तो किसी की वाणी में स्पष्टता आ जाती है । नेति का एलर्जी पर जबरदस्त प्रभाव पडता. है । एलर्जी अनेक प्रकार को होती है । विज्ञान सौ से अधिक एलर्जी की जाँच  कर चुका है जैसे धूल से एलर्जी, कपड़े से एलर्जी, वातावरण से , इत्यादि।

यदि किसी प्रकार का श्वसन सम्बन्धी रोग, जैसे, दमा या ब्रोकाइटिस” हो, तो उसका एक कारण एलर्जी भी है । नेति क्रिया के अभ्यास से ये बीमारियों भी ‘ठीक हो जाती है,  इससे अनिद्रा एवं थकावट नहीं होती है । नासिका के उन सूक्ष्म नाडी त्तन्तुओं पर  जो आँखों और कानो  से जुड़े रहते हैं, इसका बहुत अच्छा प्रभाव पडता. है।

श्वसन क्रिया सहज हो जाने से फेफडे को शुद्ध आक्सीजन काफी मात्रा में  मिलती है और इस कारण इस प्रकार की कोई बीमारी नहीं होने पाती और शरीर सदा स्वस्थ रहता है । यह है नेति क्रिया की दैनिक जीवनं में उपयोगिता है ।

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