स्वामी विवेकानंद का जीवन परिचय | Swami Vivekananda Biography in Hindi

स्वामी विवेकानंद :- Swami Vivekananda वह व्यक्ति जिसके विचार हमेशा सभी को सकारात्मक ऊर्जा र्जा देते रहेगे। जो हमेशा नव युवको के लिये आदर्श बना रहेगे । जिसमें सब कुछ सकारात्मक ही सकारात्मक दिखायी  देता है। ऐसे महान व्यक्ति स्वामी विवेकानन्द का जन्म 12 जनवरी 1863 पोश कृश्ण सप्तमी , विक्रम सम्वत् 1919 , युगाब्द 4965 को मकर संक्रान्ति के दिन कोलकता में दत्त परिवार में हुआ था।

इनके पिता का नाम विष्वनाथ दत्त तथा माता का नाम भुवनेष्वरी देवी था। इनके बचपन का नाम नरेन था तथा इन्हे संन्यास लेने से पहले इन्हे नरेन्द्र नाम से जाना जाता था। इनका परिवार सम्पन, उदार ओर विद्धता के लिये प्रसिद्ध था।

इनकी माता एक अत्यन्त सरल और धार्मिक प्रवृति की स्त्री थी। इनके पैदा होने से पहले इनकी माता ने भी संतान प्राप्ति के लिये व्रत तथा भगवान शंकर की पुजा थी। एक दिन इनकी माता ने स्वप्न में भगवान शंकर को देखा और भगवान शंकर ने इनके पुत्र के रुप में जन्म लेने का वचन दिया था।

इनके पिता कलकता उच्च न्यायलय में वकील थे। वह वहां पर अटांर्नी एट लां के पद पर आसीन थे । वह भी एक अदभुत प्रतिभा रखने वाले व्यक्ति होने के साथ साथ उदार, धार्मिक, गरीबो के प्रति सहानुभुति रखने वाले व विचारवान व्यक्ति थे ।

स्वामीजी के जीवन पर इनके माता पिता के विचारो का गहरा प्रभाव था । इनकी माता ने बचपन में कभी भी इनके अन्दर नकारात्कता का भाव पैदा नही होने दिया।

विवेकानंद जी का बचपन

स्वामी जी बाल्य अवस्था से ही एक तेजस्वी तथा नटखट बालक थे । इनको सभालने के लिये घर पर दो दो नौकरानियो कि व्यवस्था कि गयी थी। लेकिन जब नरेन्द्र इन से भी नही सभलते तो इनकी माता इनके उपर शिव शिव कहते हुये पानी छिटकती तो वह शांत हो जाते।

विवेकानन्द जी के बचपन का एक खास किस्सा 

वह किसी की भी बात नही मानते । और जब तक खुद सारी बातो को अपने तर्क की कसोटी पर नही कस लेते तब तक कोई भी बात नही मानते। स्वामी जी बचपन में अपने मित्र के यहां खेलने जाते थे। वही आंगन में एक चम्पक का पेड हुआ करता था। जिसकी एक टहनी पर वह बार बार लटक रह थे।

एक दिन उनके मित्र के दादा जी को लगा की कही ये गिर ना जाये तो उन्होने विवेकानंद जी से कहा इस पेड पर मत चढा करो। तो उन्होने पुछा क्यो। दादा जी ने नरेंद्र को समझाया इस पेड पर भूत रहता है । जो काफी खतरनाक है। यह कह कर दादा जी चले गये।

बालक नरेन्द्र के दोस्त तो डर गये। लेकिन वह नही डरे और और तुरंत पेड की डाल पर चढ गये। अपने दोस्त से कहने लगे की तुम कैसे मान सकते हो कि पैड पर भूत रहता है। और कहने लगे यहां कोई भूत नही रहता है।

इनकी योग संगीत, खेलकुद, आध्यात्म मे काफी रुचि थी। इनकी माता के द्धारा इन्हे रामायाण और महाभारत की कहानिया सुनायी जाती थी। जो बालक नरेन्द्र के मन पर गहरी छवि बनाकर जाती। और उन्हे इन सब पर विश्वास हो जाता । और वह वैसा ही बनने का प्रयास करते।

वह हनुमान जी की कहानी सुनकर उनकी तरह बलवान बनने का प्रयास करते। और अखाडे में जाकर कुश्ती कर के आते। वह ऋषि मुनियो की कहानियां सुनकर उनकी ही तरह ध्यान लगाते। वह अपने मित्र के साथ मंन्दिर में जाकर ध्यान करते । उन्होने सुना था कि ऋषि मुनियो की दाडी ध्यान करते करते जमीन में आकर छुने लगती । तो वह भी बीच बीच में अपनी दाडी देखते ।

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वह बचपन से ही गरीबो तथा पशु पक्षियो के प्रति दयालु थे। वह अपने पहने हुये कपडे भी लोगो को दान में दे दिया करते थे। एक बार तो इनके घर वालो ने इनकी दान देने की आदत के कारण इनको कमरे में बंद कर दिया था।

लेकिन इन्होने फिर भी पहना हुआ कोट खिडकी से बिखारी को दे दिया था। वह पशु पक्षियो से भी काफी प्रेम करते थे। उनके पिता ने उनका लगाव देखते हुये घर पर ही उनके पंसदिदा पशु पक्षी रखे हुये थे।

स्वामी विवेकानन्द जी की शिक्षा – Swami Vivekananda Education in Hindi 

स्वामी जी को 6 वर्ष की आयु में स्कूल भेजा गया । स्वामी जी की स्मरण शक्ति काफी तेज होने से वह पूरा संस्कृत व्याकरण तथा महाभारत व रामयण का काफी बडा हिस्सा सरलता से याद कर गये। वह स्कूल में अपने व्यक्तित्व के कारण छात्रो के बीच निर्विरोध नेता हुआ करते थे।

उनके पिता अक्सर उन्हे प्रसिद्ध विद्धानो से मिलाते और कही विषयो पर उनको चर्चा का अवसर दिया करते थे। उन्होने अपने पिता से किसी विषय पर कैसे चर्चा तथा सत्य को उसके सभी रुपो में देखने का तरीका व वर्ता को उसके मूल बिन्दू पर बनाये रखने की कला भी सीख ली थी ।

1879 में विवेकानंद जी ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उतीर्ण की। अब तक वह अंग्रेजी व बंगला साहित्य की काफी उच्च स्तरीय पुस्तके पढ चुके थे। स्वामी जी का प्रिय विषय इतिहास हुआ करता था।

अब उनका दाखिला कलकते के प्रेसीडेसी कांलेज में कराया गया। फिर एक साल के बाद उन्होने जनरल एसेम्बलीज इंस्टीटयूशन में प्रवेश लिया। प्रथम दो वर्ष उन्हाने पाश्चात्य तर्क शास्त्र को पढा और फिर पाश्चात्य दर्शन व यूरोप के प्राचीन इतिहास का गहन अध्ययन किया था। अपनी अच्छी स्मरण शक्ति के कारण वह ग्रीन के द्धार लिखा गया अंग्रजो का इतिहास पढने में उन्हे मात्र तीन दिन लगे थे।

स्वामी जी जब बी ए की परीक्षा दे रहे थे उसी समय से उनकी आध्यात्मिक शक्ति जगने लगी थी । और सन्यासी जीवन की और इनका झुकाव बढने लगा था। यह परीक्षा भी इन्होने सरलता से पास कर ली ।

एक बार प्रोफेसर हेस्टी इनकी प्रशंसा करते हुये कहा था कि यह एक प्रत्यक्ष प्रतिभाशाली नव युवा है। मै दूर दूर की यात्रा पे गया हूं। लेकिन ऐसी प्रतिभा एवं संभावनाओ वाला युवा कभी नही देखा।

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इसके साथ इनका संगीत की और भी गहरा झुकाव था। इन्होने वादय एवं स्वर संगीत दोनो का अध्ययन किया था। वह अनेक प्रकार के वादय में पांरगत थे। उन्हे गायन का भी काफी लगाव था। उन्होने हिन्दी, उर्दू तथा फारसी के अनेक भक्ति गाने एक मुसलमान अध्यापक से सिखे थे।

इसी प्रकार विवेकानंद अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के साथ बडे होते गये । जब विवेकानंद कांलेज में थे तब ही उन्होने प्रो हेस्टी से रामकृष्ण के बारे में सुना था। लेकिन उस समय उन्होने उस बात पर अम्ल नही किया था।

आध्यात्मिकता व सन्यास  का उदय

लेकिन अब वह समय आ गया था। जब उनके अन्दर की आध्यात्मिक शक्ति बढ रही थी । वह एक श्रेष्ठ गुरु की तलाश कर रही थी ।

उन दिनो स्वामी जी एक धार्मिक गुरु देवेन्द्रनाथ ठाकुर से ध्यान का अभ्यास सीखते थे। इनका ध्यान एक चरम बिन्दु पर जाकर टूट जाता । जिससे स्वामी जी के अन्दर की प्यास और बढ गयी। स्वामी जी घर भी ध्यान का अभ्यास किया करते लेकिन उनके मन की प्यास नही बुझती थी। देवेन्द्रनाथ जी स्वामी जी की और शिक्षार्थीयो से काफी तारीफ किया करते थे।

अब एक दिन जब स्वामी जी अपने अन्दर उठ रहे सवालो को नही रोक पाये तो वह आवेश में देवेन्द्रनाथ जी की और अपने सवालो का जबाव मांगने चल पडे।

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उन दिनो देवेन्द्रनाथ जी गंगा के बीच नोका में रहकर ध्यान किया करते थे। वह उस समय ध्यान मे थे। विवेकानंद जी तेजी के साथ सीधे ही नोका में चले गये और उनके सामने जाकर उच्चे स्वर में बोले महर्षि क्या आपने भगवान को देखा है।

इस आवेग से उनका ध्यान भंग हो गया उन्होने अपनी आंखे खोली पर कुछ नही बोले। फिर थोडी देर तक उन्होने विवेकानंद की आंखो में आंखे डाल कर रखी और बोले तुम्हारी आंखे ठीक वैसे है जैसे योगियो कि आंखे होती है।

विवेकानंद जी को अपने प्रश्न का उतर न मिलने के कारण वापस घर लोट आये। अपना यही सवाल उन्होने किसी और धर्म गुरु के समक्ष भी रखा पर वह भी शांत रहे। फिर वह परेशान हो गया कि अब इस सवाल का जबाब कौन देगा। उसी समय उन्हे दक्षिण में रहने वाले श्री रामकृष्ण परमहंस की स्मृति हुयी।

विवेकानंद जी रामकृष्ण जी से पहली बार अपने मित्र सुरेंद्रनाथ के घर पर मिले थे। वहां पर विवेकानंद जी ने भजन गाये थे। जिससे सभी काफी तृप्त हुये थे। और रामकृष्ण जी भी पहले वर्ता में ही इनकी और आकृष्ट भी हुये थे।

अब विवेकानंद जी अपने सवालो के जबाव मांगने के लिये द़िक्षणेश्वर परहहंस जी के पास पंहुचे। वहां उन्होने पाया कि इनका चाल, बात करने का तरीका व व्यवहार तो बिलकुल ही अलग ही है। वह अपनी जीवा से जो कुछ भी बोलते उसका सत प्रतिशत पालन भी करते । वह जो भी आध्यात्मिक बाते बोलते वह सब एकदम सरल शब्दो में कहते ।

इनकी सत्यता व मन की श्रदा व समाधि को देखकर विवेकानंद जी को इन पर विश्वास हो गया कि यह सही में ईश्वर के लिये सर्वत्यागी है। इनका विश्वास इन पर पक्का हो गया और वह समझ गये कि यह सत्य को समझने वाले व धारण करने वाले महान व्यक्ति है।

अब वह जिस प्रश्न का जबाव मांगने वहां गये थे वह प्रश्न लेकर रामकृष्ण की और बढे। उन्होने उनसे पुछा क्या आप ने भगवान को देखा है। रामकृष्ण जी ने सीधे शब्दो में तुरंत उतर दिया हां देखा है ठीक वैसे ही देखा है जैसे तुम्हे देख रहा हूं।

बल्कि उससे भी ज्यादा स्पष्टता पूर्वक देखता हूं। तुम लोगो में जिस तरह देख रहा, बात कर रहा हूं। बिलकुल इसी तरह भगवान को भी देख सकते है उनसे बात कर सकते है।

लेकिन ऐसी इच्छा रखता कौन है। लोग अपने संसारिक माया जाल से निकलना ही नही चाहते। भगवान को नही देखा इसके लिये कौन रोता है। यदि कोई सच्चे मन और भाव से भगवान के लिये व्याकुल हो जाये तो वह निश्चय ही दर्शन देते है।

यह सब सुनकर विवेकानंद जी सोच में पड गये कि सत्य में कोई भी मनुश्य इस प्रकार का त्याग नही करता है और जो करता है वह कोई मन का विरला ही होता है। वह समझ गये यह व्यक्ति कोई साधारण व्यक्ति नही है। उनको शीश झुकाकर विवेकानंद जी वापर घर को चले आये।

विवेकानंद जी ने इन्हे अपना गुरु मानने के बाद वह मन से ईश्वर के दर्शन के लिये भजन साधना में लीन रहने लगे। विवेकानंद जी गुरु की सेवा के साथ साथ कठोर तप में लीन रहने लगे। उनके अंदर निर्विकल्प सामाधि की तेज इच्छा जागने लगी ।

एक दिन उन्होने अपने मन की यह इच्छा का बखान रामकृष्ण जी के समीप कर दिया और कहने लगे कि मुझे इच्छा होती है कि में चार पांच दिन तक सामाधि में लीन रहूं और केवल देह की सुरक्षा के लिये भोजन ग्रहण करु व फिर सामाधि में लीन हो जांउ।

इस प्रकार की बाते सुनकर श्री रामकृष्ण ने तिखे शब्दो में स्वामी जी को बोले- छी छी तू इतना उतवला है, तेरे मुख से ऐसी बाते अच्छी नही लगती है। मै तो सोच रहा था कि तू एक विशाल बरगद का पेड बनेगा जिसकी छाया से हजारो मनुश्यो का उदार होगा। ऐसा न कर तू केवल स्वयं को मुक्त करना चाहता है।

यह सब सुनकर स्वामी जी का हदय पाश्चाताप से भर गया और वह चुपचाप से आंसू बहाने लगे।

यह वही समय था जब श्री रामकृष्ण के कारण हमें एक महानविभूति की प्राप्ति हुयी। इस प्रकार स्वामी जी को रामकृष्ण जी ने संसार और भारत के कल्याण महान काम सौपा।

शिकागो धर्म सम्मेलन में स्वामी जी का भाषण

कुछ समय बाद जब स्वामी जी जब ट्रेन से सफर कर रहे थे तो उन्हे शिकागो धर्म सम्मेलन के बारे मे पता चला और उन्होने वहां जाने की ठान ली । और कैसे भी करके वह दूर देश एक उम्मीद लेके चल पडे वहां पहुचकर स्वामी जी को धर्म सभा तक पंहुचने के लिये काफी कष्टो का सामना करना पडा । लेकिन स्वामी जी ने हार नही मानी और धर्म सभा में उनकी प्रतिभा ने उन्हे पहुंचा दिया ।

कोलम्बस हांल अलग अलग देशो से आये धर्म प्रचारको से खचा खच भरा हुआ था।  जब  स्वामी जी ने भाषण दिया उससे सारे विश्व को यह पता चल गया की सनातन के मार्ग पर चलने वाला हिन्दुधर्म कितना पुराना है। जो किसी की निन्दा नही करता।

स्वामी जी का भाषण शुरु होने के बाद हाल अगले पांच मिनटो तक तालियो से गुजता रहा। स्वामी जी का भाषण का समय समाप्त होने पर भी लोग उन्हे और सुनना चाहते थे। इसलिये स्वामी जी के भाषण अमेरिका में जगह जगह रखे जाने लगे। भारत को अपनी खोयी हुयी प्रतिभा वापस मिल गयी थी। लोग भारत आकर हिन्दु धर्म के बारे में और सुनना चाहते थे।

स्वामी जी ने भारत वापस आकर 1 मई 1897 को रामकृष्ण परमहंस मिशन की स्थापना की । स्वामी जी ने कन्याकुमारी से लेकर अल्मोडा तक भारत का भ्रमण कर यहां के युवाओ को जगह जगह प्रेरित किया ।

स्वामी विवेकानन्द जी की मृत्यु

और स्वामी जी के द्धारा कहे गये एक एक शब्द सदा मनुष्यो को प्रेरित करते रहेगे। स्वामी जी ने 4 जुलाई 1902 को अपना शरीर त्याग कर सदा के लिये अमर हो गये।

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