भगवान गणेश जी प्रथम पूजन की कथा

एक समय की बात है स्वर्ग लोक में देवताओं की सभा हुई थी। बड़े छोटे की बात चल पड़ी कि कौन बड़ा है और कौन छोटा। आखिर में यह निर्णय हुआ कि जो सबसे पहले ब्रह्मांड की सात फेरे करके आएगा उसी को बड़ा माना जाएगा।

सब अपनी अपनी सवारी लेकर चल पड़े। भगवान गणेश जी का भारी शरीर और सवारी चूहे की। उन्होंने अपने मन में सोचा कि इस तरह मैं कैसे इतनी जल्दी पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाऊंगा।

इसमें उन्होंने समझदारी से काम लिया। चूहों को बुलाकर कहा की सारी धरती पोली कर दो। धरती पोली हो गई। सभी देवी देवता के रथ धस गए।

इधर भगवान श्री गणेश ने अपने चूहों पर चढ़कर भगवान शिव पार्वती के चारों तरफ सात फेरे लगा लिए।

उधर सभी देवताओं ने सरस्वती को याद किया। मां सरस्वती ने बताया कि यह करतूत भगवान श्री गणेश की है । आप सब श्री गणेश और विष्णु भगवान की पत्नी को याद करो।

सब ने सरस्वती जी की बात मानी और उन्हीं को याद करने लगे। भगवान विष्णु की पत्नी मां लक्ष्मी ने सबको गड्ढों से धकेल दिया। तब सब चलकर बैकुंठ में आ गए।

भगवान ने कहा श्री गणेश जी ने सबसे पहले फेरी लगाई। सभी देवता बोले कि जब मेरे में सारी त्रिलोकी है तब पृथ्वी कहां गई । इन्होंने मेरे सात फेरे लिए और आप लोगों ने भी तो संकट में इन्हीं को याद किया था।

भगवान की बात सब ने मान ली और गणेश जी सबसे बड़े माने गए । हे महाराज जिस प्रकार देवताओं का संकट काटा। उसी तरह सब का संकट काटना।

गणेश जी के फेरी के बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि इन्होंने शिव पार्वती की फेरी लगाई थी। कोई कहते हैं कि राम नाम लिखकर सात चक्कर लगाए थे। राम नाम भी सबसे बड़ा माना गया है। इस प्रकार तब से गणेश जी को सर्वप्रथम पूजा जाता है।

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