करवा चौथ व्रत कथा

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ कहते हैं। स्त्रियों का यह मुख्य त्यौहार है। यह दशहरे के 10 दिन के बाद आता है। प्रत्येक सुहागन स्त्रियां अपने पति की लंबी उम्र के लिए यह व्रत करती है।

इस दिन निर्जला व्रत करें। चंद्र दर्शन के बाद चंद्र को अर्घ्य देकर भोजन करना चाहिए। इस दिन को रे वस्त्र धारण करनी चाहिए। इस दिन लाल वस्त्र धारण करने का विधान है।

स्त्रियां मां लक्ष्मी का ही स्वरूप है इसीलिए स्त्रियों को सुंदर सोलह सिंगार करना चाहिए। वैसे तो प्रत्येक दिन श्रृंगार करते हैं परंतु उस दिन 16 शृंगार ओं का विशेष महत्व है।

कहा जाता है कि इस्त्री जितना अधिक श्रृंगार करती है उससे उसके पति की आयु बढ़ती है। कई स्त्रियां परस्पर चीनी या मिट्टी का करवा करती है, कई स्त्रियां परस्पर चीनी या मिट्टी का करवा आदान प्रदान करती है। प्रिया जो बयाना निकाले वह अपनी सासू जी के चरण छू कर उन्हें दे।

कथा

एक साहूकार था। जिसके सात बैठे थे और एक बेटी थी। सातों भाई व बहन एक साथ बैठकर भोजन करते थे। 1 दिन कार्तिक की चौथ का व्रत आया।

तो भाई बोला कि बहन आओ भोजन करें। बहन बोली कि आज करवा चौथ का व्रत है। चांद उगने पर खाऊंगी सब भाइयों ने सोचा कि चांद उगने तक बहन भूखी रहेगी।

तो एक भाई ने दिया जलाया। दूसरे भाई ने चीमनी लेकर उसे ढका और नकली चांद दिखा कर बहन से कहने लगे चल बहन चांद आया है अर्घ्य दे दे।

बहन ने अपनी भाभियों से कहा कि चलो अर्घ्य दे दे। तो भाभियों बोले तुम्हारा चांद उगा होगा हमारा चांद तो रात को उगेगा। बहन ने अकेले ही अर्घ्य दे दिया और जब खाने लगी तो पहले ही ग्रास में बाल आ गया और दूसरे ग्रास में कंकड़ आ गया।

तीसरा ग्रास मुंह की ओर किया तो ससुराल से संदेश आ गया कि उसका पति बहुत बीमार है। जल्दी भेजो मां ने लड़की को विदा करते समय कहा कि रास्ते में जो भी मिले उसके पांव छूना और जो कोई सुहागन का आशीष दे तो पल्ले में गांठ लगाकर उसे कुछ रुपए देना।

बहन जब भाइयों से विदा हुई तो रास्ते में जो भी मिला उसने यही आशीष दिया कि तुम सात भाइयों की बहन हो तुम्हारे भाई सुखी रहे और तुम उनका सुख देखो। सुहाग का आशीष किसी ने भी नहीं दिया।

जब ससुराल पहुंची तो दरवाजे पर उसकी छोटी ननंद खड़ी थी। उसने उसके भी चरण छुये, तो उसने कहा कि सुहागन रहो। सपूत ई हो उसने यह सुनकर पल्ले में गांठ बांध ली और ननद को सोने का सिक्का दिया। जब भीतर गई तो सास ने बताया कि उसका पति धरती पर पड़ा है।

तो वह उसके पास जाकर उसकी सेवा करने के लिए बैठ गई। बाद में सास निकासी के हाथ बची कुची रोटी भेज दी। इस प्रकार समय बीते बीते मार्गशीर्ष की चौथ आई।

तो चौथ माता बोली करवा ले भाइयों की प्यारी करवा ले । लेकिन जब उसे चौथ माता नहीं दिखी तो वह बोले हे माता आपने मुझे उजाड़ा तो आप ही मेरा उद्धार करोगी। आपको मेरा सुहाग देना पड़ेगा

तब उसे चौथ माता ने बताया की पौष की चौथ आएगी। वह मेरे से बड़ी है उसे ही सब कहना वह तुम्हारा सुहाग देगी।

पौष की चौथ आकर चली गई। मांग की फाल्गुन की चौथ आकर चली गई चैत्र वैशाख जेष्ठ आषाढ़ और सावन भादो की सभी चौथाई और यह कह कर चली गई कि आगे वाली को कहना।

अश्विन की चौथ आई तो उसने बताया कि तुम पर कार्तिक की चौथ नाराज है। उसी ने तुम्हारा सुहाग लिया है वहीं वापस कर सकती है वह आएगी तो उसके पांव पकड़कर विनती करना यह बतला कर वह भी चली गई।

जब कार्तिक की चौथाई तो वह गुस्से से बोली भाइयों की प्यारी करवा दे। दिन में चांद उगाने वाली करवा ले। व्रत खंडन करने वाली करवा ले। भूखी करवा ले।

तो यह सुनकर चौथ माता को देखकर उसके पांव पकड़कर गिर गिर आने लगी। चौथ माता मेरा सुहाग तुम्हारे हाथ में है आप ही मुझे सुहागन करें।

तो माता बोली पापन हत्यारिन मेरे पांव पकड़ कर क्यों बैठ गई। तब वह बोली। जो मुझसे भूल हुई उसे क्षमा कर दो।

अब भूल नहीं करूंगी। तो चौथ माता प्रसन्न होकर अपनी आंखों से काजल व नाखूनों से मेहंदी और छींके में से रोली लेकर छोटी उंगली से उसके आदमी पर छिट दिया तो वह उठ कर बैठ गया और बोला कि आज मैं बहुत सोया वह बोली सोए हुए तो आपको 12 महीने हो गए अब जाकर चौथ माता ने सुहाग लौट आया है।

जिस तरह से साहूकार की बेटी का सुहाग दिया उसी तरह चौथ माता सबको सुहागिन रखें। यही करवा चौथ व्रत की पुरातन महिमा है करवा चौथ माता की जय।

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