शनि देव के प्रभाव एवं निवारण हेतु उपाय और जानिए कैसे मुक्त रहे मुक्त रहे शनि देव के प्रभाव से

नवग्रहों में शनि अत्यधिक दूरी का ग्रह है और तीन वलयाकार दलों से गिरा है इसके 9 उपग्रह चंद्रमा है।

कुछ मतों से इसकी संख्या 10 कही गई है शनि को सूर्य की परिक्रमा करने में करीब 30 वर्ष लगते हैं।

कहा जाता है कि रावण ने अपने पुत्र मेघनाथ के जन्म समय सब ग्रहों को 11 वे स्थान में रहने को कहा।

परंतु देवताओं की विनय पर शनि ने अपना पैर बारहवें घर में फैला दिया। रावण को जब पता चला तो उसने शनि पर प्रहार करके उसके पैरों को काटकर लंगड़ा बना दिया।

तब से शनि एक राशि के भ्रमण करने में ढाई साल का समय लेता है। नव ग्रह में शनि अशुभ ग्रह माना जाता है और शनि की दशा अंतर्दशा और साढ़ेसाती का बोध होते ही मनुष्य भावी आपदाओं और अनिष्ट से भयभीत हो जाता है।

शनि अपने स्थान से तीसरे साथ में वह दशामा भावों को देखता है। शनि की दृष्टि विश्व में और विनाशकारी होती है।

परंतु यह फल शनि के कुंडली में अशुभ संबंध होने पर होते हैं। कहते हैं कि शनि की दृष्टि जन्म होते ही अपने पिता सूर्य पर पड़ी। सूर्य कुष्ठ रोग से ग्रसित हुए। सारथी अरुण पंगु हो गया और घोड़े अंधे हो गए।

अशोक स्थान भाव में शनि प्रधान व्यक्ति लोक कल्याण के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। यह उदार राष्ट्रप्रेमी कार्य में तत्पर और परोपकारी वृत्ति के होते हैं।

इनके कार्य वसुदेव कुटुंबकम की भावना से प्रेरित होते हैं। ऐसे लोग लेखन प्रकाशन के कार्य तथा शास्त्रों के ज्ञान के प्रसार कार्यों में रत रहते हैं।

शनि प्रधान व्यक्ति पिंगल वर्ण लंबा देह वाला होता है। यह वात प्रकृति प्रधान वाले काले वर्ण का होता है। यह क्रोधी मंदबुद्धि और तामसी प्रकृति वाला होता है।

शनि के अधीन स्थानों में पर्वत, घाटियां, रेगिस्तान, कोयले की खाने और गन्दी जगहे आती है। उत्तर कालामृत की राय में शनि अपने घर उच्च राशि और बृहस्पति की राशि पर शुभ फल प्रदान करता है।

शनिवार वायु कारक ग्रह है और जन्म कुंडली में आठवें स्थान में शनि दीर्घायु देता है। शनि मकर और कुंभ राशियों का स्वामी है और नक्षत्रों में पुष्प, अनुराधा और उत्तराभाद्रपद का स्वामी है।

कुंभ इसकी मूल त्रिकोण राशि है तुला राशि में 20 अंश पर उच्च होता है और मेष राशि के 20 अंश तक नीचे रहता है।

इसका रंग काला है यह ग्रह वायु तत्व का है। दुख और दर्द का सूचक है। वर्णों में इसे शुद्ध की पदवी प्राप्त है। बुध और शुक्र इसके मित्र हैं।

बृहस्पति संभव और सूर्य चंद्रमा तथा मंगल दुश्मन है। इसकी दिशा पश्चिम है। यह सूर्य से 15 अंश पर अस्त होता है।

इसकी विषोत्री दशा 19 साल की होती है। वृष तुला मकर और कुंभ लग्न के लिए शनि ग्रह शुभ फल प्रदान करता है। जन्म राशि से एक राशि पूर्व शनि के आगमन पर इसकी साढ़ेसाती शुरू हो जाती है।

और जन्म राशि के एक राशि बाद समाप्त होती है। जन्म राशि से चतुर्थ और अष्टम स्थान पर शनि के भ्रमण को शनि की आढेया कहते हैं।

शनि विपरीत होने पर अपनी आढेया और साढ़ेसाती में अनेक प्रकार की व्याधियों दर्द मंदाग्नि पक्षाघात यक्ष्मा और स्वास्थ्य आदि रोगों से दुखी रहता है।

और अनुकूल होने पर असाधारण यश कीर्ति और सुख देता है। शनि त्रस्त मनुष्य ईश्वर को याद करता है। और उसमें वैराग्य भाव पैदा होता है।

ऐसा मनुष्य माया मोह से दूर एकाकी जीवन बिताने वाला। ईश्वर भक्ति में लीन हो जाता है। और वह सद्गति प्राप्त करता है।

शनि अपनी उच्च राशि में होकर नवांश मैं नीचे राशि का हो तो पूर्वार्ध में उसकी दशा शुभ और उत्तरार्ध में सुख प्राप्त होता है।

शनि के ग्रह की पीड़ा की शांति के लिए काले घोड़े की नाल का छल्ला या नाव की कील का छल्ला पहनना उपयोगी बताया गया है।

शनिवार के दिन पीपल वृक्ष को जल देना हितकर होता है। इस ग्रह का रत्न नीलम है। और इस रत्न की अंगूठी भी शनि की पीड़ा को दूर करने में सहायक है। यह किसी विशेषज्ञ से परामर्श करके पहननी चाहिए।

बिना आवश्यकता के पहनना हानि भी कर सकता है। शनि ग्रह की शांति के लिए तिल, उड़द, काला वस्त्र लोहा और नीलम दान दिया जाता है।

शनि देव की क्रूरता से छुटकारा पाने के लिए शनिवार को सरसों के तेल में अपनी छाया देखकर उसे डकोत को दान देने का अथवा साईं काल को सफेद आक की जड़ में भी डालने का प्रावधान है।

शनिवार को तेल का प्रचलन भी शनि ग्रह की हनुमंत लाल जी की याचना से ही आरंभ हुआ था।

कहते हैं वृद्धावस्था में एक बार हनुमंत लाल जी चित्रकूट में सुमेरु पर्वत की एक शीला की ओट में अपने इष्ट प्रभु राम जी का स्मरण कर रहे थे कि अचानक शनि महाराज हनुमंत जी की पीठ पर आकर बिराज गए।

हनुमंत लाल ठहरे राम जी के अनन्य भक्त उन्होंने ध्यान नहीं दिया। शनि देव जी ने अपने स्वभाव वश हनुमंत जी की पूंछ को दबाकर अपना बस दिखाने की चेष्टा में सचेत करते हुए कहा

हे पवन पुत्र आपके गोचर ग्रह पद्धति में आपके ऊपर तिरछी दृष्टि लिए अड़ाई वर्षा के लिए आने में बाध्य हु।

हनुमंत लाल जी ने अनसुना करते हुए अपने ध्यान में मग्न रहे जैसे ही सूर्यास्त होने को आया अपनी नित्य नियमानुसार सुमेरु पर्वत की परिक्रमा हेतु जय श्री राम जय श्री राम का उद्घोष करते हुए सनी को अपनी पूंछ में लपेट कर मस्ती, सेवा, लीला करते कभी एकशीला से दूसरी शीला, कभी ऊपर कभी नीचे करते हुए और पूंछ को भी उसी तरह इधर-उधर पत्थरों पर पटक ते हुए।

परिक्रमा में राम गुणगान में आनंदित होते परिक्रमा करके जब वापस आए तो उन्होंने लहूलुहान हुए शनि को अति व्यथित और व्याकुल आपने पूछा कहो कैसे हो कैसी है आपकी दृष्टि।

जब राम भक्त हनुमान जी से शनि ने अति विनीत भाव से क्षमा याचना करते हुए अपने जीवन की भीख मांगी और दया सिंधु हनुमंत जी ने इस शर्त से क्षमा किया कि वह कभी किसी राम भक्तों को नहीं सताएंगे।

जो शनि के जख्मों पर तेल दान देगा अथवा हनुमंत लाल जी को अर्पण करेगा उस पर शनि का प्रकोप कभी नहीं होगा।

मानव जाति के होने के कारण हनुमान जी को काले चने व गुड अति प्रिय है। शनि का भी प्रिय भोजन यही है।

शनिवार को हनुमानजी को अथवा वानरों को चने खिलाने से शनि की प्रसन्नता मिलती है और उसके कोप से मुक्ति मिलती है नित्य प्रति सुंदरकांड एवं श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगल बुध शनि ग्रहों का प्रभाव दूर होता है।

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