संत कबीर दास का जीवन परिचय


संत कबीर दास जी का जन्म सन 1398 में काशी नामक गांव के उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका जन्म एक निर्धन जुलाहा के घर में हुआ। यह बहुत ही गरीब थे।

कबीर बचपन से ही बहुत जिज्ञासु, दयालु और नरम स्वभाव के थे। दयालु तथा नरम स्वभाव के कारण इन्हें कमजोर समझा जाता था। यह पढ़ाई लिखाई में बहुत रूचि रखते थे।

उस समय पर विद्यालय की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। व्यक्ति अपने कार्य व्यवसाय में व्यस्त रहते थे। और बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया जाता था। लेकिन इन्हें पढ़ने में बहुत रुचि थी।

यह गुरु आचार्य रामानंद जी के पास गए। इन्होंने मन में ही इन्हें गुरु धारण कर लिया था। उन्होंने इन्हें अपना शिष्य बनाने से इनकार कर दिया था। पर उन्होंने ठान ली थी कि यही मेरे गुरु है।

इनके द्वारा ही मेरा मार्गदर्शन होना है। वह लंबे समय तक प्रयत्न करते रहे। और उन्हें खुश करने में लगे रहे। वह जानते थे कि वह एक दिन उन्हें मना ही लेंगे। इन्होंने गुरु को देखा कि यह सुबह 4:00 बजे उठकर गंगा स्नान के लिए जाते हैं। वहां इनसे बात करूंगा।

वह सीढ़ियों पर जाकर लेट गए। गुरु जब स्नान के लिए गए। तो उनका पैर कबीर के ऊपर पढ़ा। उनके गुरु का पैर इनके हाथ पर लगा। तो उनके मुख से राम राम निकला तो उन्होंने उसे राम नाम को ही दिशा मान लिया । राम नाम के प्रचार के लिए वह निकल पड़े।

राम को केवल एक ही ईश्वर माना। मूर्ति पूजन का खंडन किया। मंदिर मस्जिद को यह नहीं मानते थे। मुसलमान और हिंदू को भी बहुत से तर्क दिए। अपने दोहों छंदों के रूप में पाखंड आडंबर का खंडन करते हैं।

यह सत्य का प्रचार करना और असत्य का खंडन करना चाहते थे। संत कभी आइए संत कहे कबीर एक विचारधारा का नाम है । जिसमें इन्होंने सत्य का पालन और असत्य का खंडन करने को कहा इनका परिवार भी था।

कुछ समय बाद एक का विवाह हुआ इनकी पत्नी का नाम लोई था यह अपनी पत्नी को भी यही ज्ञान देते थे पर इनकी पत्नी भक्ति भाव से परिपूर्ण थी यह भी ईश्वर को मानती थी।

लेकिन इन्होंने भी अपनी विचारधारा के अनुसार इन्हें डाल दिया इनके दो बच्चे थे इनके एक पुत्र का नाम का माल और एक पुत्री का नाम कमली था रामानंद जी इन के गुरु थे इसी प्रकार इनका जीवन चलता रहा।

इन्होंने पांच प्रकार की भाषाओं का अध्ययन किया जैसे खड़ी बोली राजस्थानी हरियाणवी बृज अवधि बहुत सी भाषाएं थी पंचमेल खिचड़ी इनकी बोली थी इन्होंने बहुत सी पुस्तकें भी लिखी।

यह हिंदी भाषा के अनुयाई थे अपने दोहों के माध्यम से इन्होंने सत्य का उजागर करने और असत्य का खंडन करने को कहा कसगर में 1518 ईस्वी में 120 साल का इनका जीवन था इन्होंने नाथ परंपरा को माना यह तंत्र को भी माना पत्थर पूजे वाला दोहा भी संत कबीर जी का दोहा है।

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