आठ प्रकार की सिद्धियां

योग के मार्ग पर यदि कोई पुरी निष्ठा पूर्वक चलने का संकल्प ले । सभी नियमो का दृढ़ता पूर्वक पालन करे । तो आगे चलकर उसको आठ प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती है जिनको अष्ट सिद्धि के नाम से भी जाना जाता है । योग दर्शन में महर्षि पंतजलि ने  कहा है जब एक योगी का पांच भूतो यानि पंच तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश की पांच अवस्थाओ स्थूलाअवस्था, स्वरुपावस्था, सूक्ष्मावस्था, अन्वय-अवस्था, अर्थवत्व अवस्था पर अधिकार हो जाता है या प्रत्यक्ष कर लेता। तब

                ततोअणिमादिप्रादुर्भाव कायसम्पतद्धार्मानभिघातश्च ।।

उसे इन्ही भूतो के माध्यम से उसे (i) आठ प्रकार की सिद्धयां (अष्ट सिद्धि) (ii) कायासम्पत की प्राप्ति (iii) पंच भूतो (पंच तत्व) पर काबू इन तीन प्रकार सिद्धियो की प्राप्ति हो जाती है।

(i) आठ प्रकार की सिद्धयां (अष्ट सिद्धि)

1 अणिमा- इस सिद्धि की प्राप्ति के बाद व्यक्ति एक सुक्ष्म अणु के समान रुप धारण कर  सकता है। जैसे एक मक्खी या चिटटी का रुप धारण कर लेना। जिस प्रकार हनुमान जी ने सुरसा को हराने के लिये छोटा सा रुप बनाकर उसके मुख में चले गये थे । लंका में अन्दर जाते हुये भी उन्होने बहुत छोटा रुप धारण कर लिया था।

2 लघिमा- शरीर को अत्यधिक हल्का कर देना। यानि जल और किचड आदि के ऊपर आप सहजता से चल सकते है। आसमान में उड सकते है। यानि इस सिद्धि के प्राप्त होने पर शरीर का वजन अत्यधिक हल्का हो जाता है

3 महिमा -शरीर को अत्यधिक बडा कर देना । जिस प्रकार हनुमान जी कही बार अपने शरीर का आकार बडा कर देते है

4 गरिमा – शरीर को भारी कर देना जैसे हनुमान जी ने पाडवो के भाई भीम के मार्ग को रोकने के लिये किया था। भीम हनुमान जी पुछ भी नही हिला पाये थे।

5 प्राप्ति – किसी भी तरह के भौतिक पदार्थ की इच्छा को संकल्प से प्राप्त कर लेने की सिद्धि हो जाती है।

6 प्राकम्य – बिना किसी बाधा के भौतिक पदार्थ सम्बन्धी इच्छा की प्राप्ति स्वाभाविक हो जाना।

7 वशित्व .- पांचो प्रकारे के भूतों पंच तत्व का अपनी सहमति में हो जाना।

8 ईशित्व – पंच भूत और भौतिक पदार्थो को विभिन्न रुपो में उत्पन करने की क्षमता और उन पर शासन करने की सिद्धि  हो जाती है।

ये आठ प्रकार की सिद्धियो की प्राप्ति योगी को जाती है। जिनका वह कही भी कभी प्रयोग कर सकता है। तथा इसके साथ साथ ही उसको

(ii)  कायासम्पत की प्राप्ति – इसके अंतर्गत योगी को बहुत सुन्दंर शरीर , सारे अंगो में योग की चमक, बल की बहुलता, सारा शरीर व्रज की भांति द्रढ हो जाता है

(iii) पंच भूतो के धर्मो में बाधा न होना- यदि योगी भूतो की पांचो अवस्थाऔ पर विजय प्राप्त कर ले तब योगी पृथ्वी के भीतर ठीक उसी प्रकार से जा सकता है जिस प्रकार से प्रत्येक मनुष्य किसी गहरे पानी के भीतर जा सकता है। और यदि कोई किसी योगी के ऊपर पत्थरो की बारिस कर दे तो भी उसके शरीर पर कोई चोट  आदि नही आती। जल में रहने पर भी उसका शरीर गलेगा नही और अग्नि उसके शरीर को जलाती नहीं है ।

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