श्रीमद् भगवत गीता दशम अध्याय विभूति योग अर्थ

श्रीमद भगवत गीता के दशमाध्याय में भगवान अर्जुन से कहते है,  हे अर्जुन! इस लोक में मुझ में प्रबल निष्ठा रखता है। ऐसे मनुष्य के लिये मै अपने  गुणतम रहस्य को भी स्पष्ट कर देता हूँ । हे अर्जुन! में देवता एवं महर्षियो का आदि कारण हूँ । अतएव मेरी  उत्पति को अर्थात प्राकटय ( उत्पति ) को देवता और महर्षि लोग भी नही जानते है। अर्जुन जो मनुष्य मुझे जन्म रहित महान ईश्वर तत्व में जानता है। वह मनुष्य सर्व प्रकार के पाप से रहित हो जाता है। प्राणियो की नाना प्रकार की शक्तियां तथा सभी प्रकार की भावनाओ का आदि कारण मै ही हूँ ।

यह सम्पूर्ण सृष्टि,  सप्तर्षि, सनक, सनन्दन, सनातन सनत कुमार, चारो कुमार तथा चौदह मनु  मेरे संकल्प मात्र से उत्पन होकर सृष्टि के कारण स्वरुप माने जाते है। क्योकि इनसे ही सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण होता है। है अर्जुन! सम्पूर्ण सृष्टि के उत्पति का कारण मैं ही हूं। मुझसे ही सम्पूर्ण सृष्टि की सत्ता है। ऐसा समझ कर ज्ञानी लोग निरन्तर मेरा चिन्तन करते रहते है।

वे लोग मेरे गुणो का वर्णन करते हुये मुझ मै ही रमण करते है। भगवान की वर्ता को सुनकर अर्जुन ने भगवान से पुछा भगवान! आपके स्वरुप को दानव देवता कोई भी नही जानते है। आप स्वयं ही अपनी आत्मा से अपनी आत्मा को जानते है। एतएव आपसे प्रार्थना है आप अपने स्वरुपों का वर्णन करने की कृपा किजिये, कि मुझे किन किन स्वरुपों का चिन्तन करना है। अर्जुन के प्रश्नो का उतर देते हुए भगवान ने अर्जुन से कहा! है अर्जुन! मेरी दिव्य विभूतियो का कोई अन्त नही है तथापि मुख्य रुप से प्रधान विभूतियो का वर्णन करता हूँ । मै सभी प्राणियो का आत्मा हूँ ।

श्लोक – अहमात्मा गुडाकेश सर्व भूताशय स्थितः।

             अहमादिश्रच मध्यं च भूताना मन्त्र एव च ।। 10/20

मैं ही सभी भूतो का (सृष्टि का ) आदि , मध्य और अन्त हूँ । है अर्जुन मैं आदियो मैं से विष्णु, ज्योतियो में से सूर्य नक्षत्रों का आदि पति चन्द्रमा, वेदो में सामवेद, देवताऔ में इन्द्र, और प्राणियो में चेतना स्वरुप हूँ । एकादश रुद्रो में शंकर (ग्यारह) में कुबेर, अग्नि तथा पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ ।

हे अर्जुन! पुरोहितो में मुझे बृहस्पति तथा सेनापतियों में कार्तिकेय महर्षियो में भृगुत्ऱ ऋषि, अक्षरो में मुझे ओकार समझों। हे अर्जुन! मैं शास्त्रो में वज्र, गौऔ में कामधेनु, दैत्यों में प्रहलाद और पशुओं में मृगराज सिंह हूँ । मै ही जलचरो का स्वामी  वरुण देवता हूँ । मैं शस्त्र धारियो में परशुराम हूँ तथा नदियो में भागीरथी नदी हूँ । यह सम्पूर्ण का आदि अन्त और मध्य मै ही हूँ ।

मै काल का भी महाकाल हूं। और मैं ही विराट स्वरुप सबको धारण, पोषण करने वाला हूं। मै छन्दो में गायत्री छन्द हूं। महीनो में मार्गशीर्ष मास हूँ । और ऋतुऔ में वसन्त ऋतु हूं। यदु वंशियो में  वासुदेव हूं। पाण्डवो में धनन्जय हूँ । और मुनियो में व्यास मुनि हूं।  तथा कवियो में शुक्रचार्य हूँ । हे अर्जुन! जो भी इस सम्पूर्ण सृष्टि का कारण है। वह कारण भी मै ही हूँ । क्योकि इस सृष्टि में कोई भी ऐसी चर- अचर वस्तु नही है। जो मुझसे रहित हो।

श्लोक – नान्तोऽस्ति  मम दिव्यानां विभूतीनां  परन्तप।

             एव तूदेशतः प्रोक्तो विभूते र्विस्तरो मया ।।  10/40

हे अर्जुन! वास्तविक  रुप से मेरी विभूतियों का कोई अन्त नही है। इस सृष्टि में जो भी ऐश्वर्य युक्त, कान्तियुक्त और शान्तियुक्त है। वह सब मेरा ही अंश समझो । हे अर्जुन! मैं इस सम्पूर्ण सृष्टि को अपनी भोग शक्ति के एक अंश मात्र से धारण करता हूँ ।

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