श्रीमद् भगवत गीता द्वितीय अध्याय “सांख्य योग अथवा ज्ञान योग” अर्थ

श्रीमद भगवद गीता के अनुसार सांख्य योग अथवा ज्ञान योग का विवेचन –

महाभारत युद्ध के प्रारम्भ में अर्जुन को अपने सम्बन्धियो को देखकर अत्यन्त करुणा उत्पन हुयी। अर्जुन की करुणा युक्त स्थिति को देखकर भगवान कृष्ण अर्जुन  से कहने लगे है अर्जुन ! तुम्हे असमय में यह श्रेष्ठ पुरुषो के द्धारा त्याज्य स्वर्ग की प्राप्ति से रहित यह मोह कैसे उत्पन गया है। है अर्जुन! तुम्हारा यह कथन अपने सम्बन्धियों, गुरु, पितामाह, इत्यादि को मारकर राज्य की सम्पति के उपयोग की अपेक्षा भिक्षा मांगकर जीवन निर्वाह करना उचित है – या सर्वथा निरर्थक है। ज्ञानी लोग ऐसा विचार नही करते है।

श्लोक –   अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाश्रच भाषसे।

                 गतासूनगतासूश्रच नानुशोचन्तिप पण्डिताः।। 2/11

 है अर्जुन ! तुम शोक करने के अयोग्य मनुष्यो के लिये शोक कर रहे हो। क्योकि पण्डित लोग जिनके प्राण चले गये है, उनके लिये भी शोक नही करते है तथा जो लोग अभी जीवित है । उनकी मृत्यु

के विषय में भी किसी प्रकार का शोक नही करते । विवेकशील व्यक्ति का प्रयत्न सार्थक दिशा में होता है। मृत व्यक्ति के लिये शोक करने से हानि के अतिरिक्त कोई भी सार्थकता  प्रतीत नही होती है । दूसरे पक्ष में जो जन्म लेता है

श्लोक – जातस्य ही ध्रुवो मृत्युः र्ध्रव जन्म मृतस्य च, 2/27

     उसकी निश्चित मृत्यु होती है। और जिसकी मृत्यु होती है उसका जन्म निश्चित होता है। अतएव जो लोग जीवित है। उनकी मृत्यु का विचार करके ज्ञानी पुरुष अपने कर्तव्य पथ से कभी भी विचलित नही होते है। है अर्जुन- जैसे इस शरीर में क्रमशः कुमार अवस्था, युवावस्था, वृद्धावस्था  प्राप्त होती है। वैसे ही जन्म के पश्चात मृत्यु, और मृत्यु के पश्चात  जन्म निश्चित है।

श्लोक – देहिनोेऽस्मिनयथा देहे   कौमारं यौवनं जरा

              तथा देहान्तर प्राप्ति र्धीरस्तत्र न मुहयति ।। 2/13

 है अर्जुन! इस सृष्टि में जिसमें सम्पर्ण दृश्य जगत व्याप्त है तुम उसको ही नाशरहित  समझो। अन्य सभी पदार्थ नाशवान है। जो व्यक्ति आत्मा को मरने वाला जानता है। तथा आत्मा को मरा हुआ समझता है। वो  दोनो ही सत्य को नही जानते है।

वास्तव में है अर्जुन! जैसे इस संसार में कौमारवस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था आती रहती है। वैसे ही जीव को एक शरीर के बाद दूसरा शरीर भी प्राप्त होता रहता है। एतएव इस विषय में धीर पुरुष  मोहित नही होते है। शीत उष्ण और सुख दुख प्रदान करने वाले इन्द्र्रिय और विषयो का संयोग, उत्पति और विनाशशील है। एतएव ये अनित्य है, इसलिये अर्जुन तुम इनको सहन करते हुये अपने कर्म पर दृढ रहो। उत्पति और विनाश वाले ये अनित्य सुख दुख जिस व्यक्ति को प्रभावित नही करते है । वह व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त करता है।

है अर्जुन ! असद वस्तुऔ की कभी भी सता अर्थात प्राप्ति नही हो सकती है और सद वस्तु का विनाश नही हो सकता है । आत्मा सदस्वरुप है। इसका किसी प्रकार से नाश संभव नही  है। इसलिये आत्मा को अजर अमर समझ कर तुम युद्ध करो नित्य स्वरुप जीवात्मा के ये शरीर नाशवान  है।

और न तो इसे पवन सुखा सकता है। यह आत्मा अव्यक्त है, आचित्य है इसलिये इस आत्मा के विषय में तुम्हे चिन्तन नही करना चाहिये। इसके अनन्तर (पश्चात) भी यदि तुम शरीर परिवर्तन को मृत्यु समझते हो तो यह परिवर्तन रुपी मृत्यु अपरिहार्य (जिसे रोका न जा सके ) है।

श्लोक –जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु ध्र्रुवं जन्म मृतस्य च।

              तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वां शोचितुमर्हसि।। 2/27

है अर्जुन आत्मा नित्य है, इसके साथ जब शरीर परिवर्तन होता है इसे यदि तुम समझते हो तो यह समझो कि जिसका जन्म होता है उसकी अवश्य मृत्यु होती है। और जिसकी मृत्यु होती है, उसका अवश्य जन्म होता है। इसलिये अवश्यम्भावी वस्तु के विषय में उसे रोकने के लिये चिन्तन करना व्यर्थ है। सभी शरीरो में यह अवश्य आत्मा विदयमान रहती है इसको मारा नही जा सकता है। इसलिये इसके विषय में चिन्ता नही करनी चाहिये।

 

Leave a Comment

error: Content is protected !!