कबीर दास के दोहे | Dohe of kabir Das in Hindi with Meaning

Dohe of kabir Das in Hindi with Meaningसंत कबीर दास जी को भला कौन नही जानता है। इन्होने अपने दोहो से हिन्दी जगत में एक अलग ही छाप छोडकर अपनी एक अलग ही पहचान बनायी। इनके दोहो को पढकर इनकी महानता और गहनता से कोई भी अनछुआ नही रह सकता। इन्होने अपने दोहो के माध्यम से समाज में फैली कुरीतीयो और अंधविश्वास से लोगो को परिचित कराया। लोगो को सदमार्ग पर चलने की सीख दी। इनके द्धारा बोले गये  दोहो Dohe of kabir Das in Hindi with Meaning को आप अर्थ सहित नीचे पढ सकते है।

Dohe of kabir Das in Hindi with Meaning – कबीर दास के दोहे

दोहा:    काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।

            पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगो कब ।।

अर्थ:  कबीर कह रहे है कि जो काम कल शुरु करना है उसे आज करो और जो काम आज के दिन करना है उसे इसी समय करो। यदि किसी भी पल में कोई भी विपदा आ गयी तो कब करोगे। इसलिये इसी क्षण करो।

 

दोहा:   धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।

           माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ।।

अर्थ: हमे सदा धैर्य से काम करना चाहिये। धैर्य से सबकुछ सम्भव हो जाता है। यदि एक माली एक दिन में सौ गमलो को पानी दे देगा । तब भी फल तो समय आने पर ही लगेगे।

 

दोहा: निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय ।

         बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि जो व्यक्ति निन्दा करते है उन्हे हमे अपने पास रखना चाहिये। क्योकि इस प्रकार के व्यक्ति बिना साबुन और पानी के हमारे स्वभाव में स्वच्छता लेकर आते है।

 

दोहा: माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।

         माँगन ते मारना भला, यह सतगुरु की सीख ।।

अर्थ: कबीर जी के अनुसार किसी से कोई चीज मांगना मृत्यु के समान है इसलिये कोई भी भीख मत मांगो। इनके सतगुरु ने भी इन्हे यही सीख दी है कि भीख मांगने से मरना अच्छा है।

 

दोहा: माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।

         कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर ।।

अर्थ: कबीर दास जी के अनुसार बहुत से लोगो को माला जपते जपते युग बीत जाता है पर  उनका मन सच्चाई की और नही मुडता है। इस प्रकार के लोग अगर माला को छोडकर यदि अपने मन की बुराई को त्याग दे तो ही इनमें सच में बदलाव आ सकता है। तब ही इनके मन का फेर बदल सकता है।

Dohe of kabir Das in Hindi with Meaning -कबीर दास के दोहे

दोहा: जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।

          यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय ।।

अर्थ: कबीर के अनुसार हमारा इस संसार में कोई भी श़़त्रु नही होगा यदि हमारा मन शांत हो जाये। यदि हम अपना अहंकार त्याग दे तो हम पर प्रत्येक व्यक्ति दया करने के लिये तैयार हो जायेगा।

 

दोहा: जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय ।

         जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय ।।

अर्थ: कबीर दास जी के अनुसार हमारा मन उसी प्रकार का हो जाता है जिस प्रकार का हम भोजन करते है। और हमारी वाणी उसी तरह की हो जाती है जिस प्रकार का हम पानी पीते है।

 

दोहा: कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार ।

          साधु वचन जल रूप, है बरसै अमृत धार ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि तीखे वचन सबसे बुरे होते है जो सबको बुरे लगते है। और अच्छे शब्द सभी को अमृत की धारा के समान लगते है।

 

दोहा: जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ ।

         मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ ।।

अर्थ: जो व्यक्ति प्रयास करता है वह फल पाता जरुर है। जब एक गोताखोर गहरे पानी मे जाता है तो कुछ न कुछ लेकर अवश्य आता है। पंरतु जो व्यक्ति डुबने के भय से पानी के किनारे पर बैठा रहता है वह किनारे ही बैठे रह जाते है।

 

दोहा: पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय ।

          ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि बहुत से लोगो का जीवन बडी बडी और मोटी किताबे पढकर बीत जाता है । पर वह तब भी विद्धान हो पाये। इनके अनुसार जो ढाई अक्षर प्रेम का पढ और समझ लेता है वही सच्चा ज्ञानी हो जाता है।

 

दोहा: साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय ।

         सार सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय ।।

अर्थ: हमारे समाज में ऐसे अच्छे लोगो की जरुरत होती है जो धान, गेहंू को साफ करने वाले सूप के समान हो। जो काम में आने वाली चीज को बचा देते है और बेकार को उडा देते है।

 

दोहा: जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान ।

          मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ।।

अर्थ: ज्ञानी व्यक्ति की जाति नही पुछनी चाहिये । हमे ज्ञानी व्यक्ति से ज्ञान के बारे में पुछना चाहिये। हमे सदैव तलवार का मोलभाव करना चाहिये नाकि म्यान का।

Dohe of kabir Das in Hindi with Meaning – कबीर दास के दोहे

दोहा: दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त ।

         अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत ।।

अर्थ: मनुष्य जब दूसरो के दोष देखता है और उन पर हंसता है। उस समय उसे स्वयं के अवगुण याद नही आते है जिनका न कोई आदि है और न अंत।

 

दोहा: बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि ।

         हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि ।।

अर्थ: हमारी बोली एक अनमोल रत्न है यदि कोई इससे बोलकर जाने। हम जो कुछ भी बोलते है हमे तराजु के समान ही प्रत्येक बात को तोलकर ही मुंह से बाहर निकालना चाहिये।

 

दोहा: अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप ।

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप ।।

अर्थ: कबीर कहते है कि ज्यादा बोलना भी अच्छा नही है और ज्यादा चुप रहना भी अच्छा नही है। जैसे ज्यादा बारिश और ज्याद धूप अच्छी नही है।

 

दोहा: दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार ।

         तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ।।

अर्थ: कबीर कहते है कि मनुष्य का जन्म बडी ही कठिनाई से प्राप्त होता है। जिस प्रकार वृक्ष से कोई पत्ता नीचे झडने पर वापस वृक्ष पर नही लग सकता । उसी प्रकार यह मनुश्य शरीर बार बार नही मिलता है।

 

दोहा: कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर ।

         ना काहू से दोस्ती, काहू से बैर ।।

अर्थ: कबीर दास जी इस संसार में आकर के ईश्वर से सभी के लिये भलाई मांगते है। वो नाही किसी से दोस्ती रखते और नाही किसी से दुश्मनी।

 

दोहा: कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन ।

         कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन ।।

अर्थ: जीवन के सारे दिन कहते सुनते निकल गये है लेकिन मेरा यह मन इस संसार में ऐसा उलझा कि सुलझ नही पाया। कभी भी में होश में नही आया। लेकिन अभी भी यह मन काबू में नही आया और इसकी स्थिति पहले दिन के समान ही लगती है।

 

दोहा: जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं ।

        जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं ।।

अर्थ: इस दुनिया में जो जिस किसी का भी उदय हुआ है उसका अस्त अवश्य होगा। जैसे जो फुल खिलता है वह अवश्य मुरझाता भी है और जो दिवार बनायी गयी है एक दिन वह अवश्य गिरेगी। इसी प्रकार जो कोही भी संसार में आता है वह यहां से एक दिन अवश्य जाता है।

 

दोहा: झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद ।

         खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद ।।

अर्थ:  है मानव तू जिस झुठे सुख को सुख बोल रहा है और मन ही मन इसको देखकर के इस पर मोहित हो रहा है। देख वह सब कैसे काल के मुंह में जा रहा है और बाकी उसकी गोद में पडा है।

 

दोहा: ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस ।

         भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस ।।

अर्थ: कबीर दास जी इस संसार के लोगो से काफी निराश होकर कह रहे है कि यहां कोई ऐसा व्यक्ति नही मिला जो हमको सदमार्ग पर चलने को उपदेश देता और भव सागर में डूब रहे मनुश्यो के बाल पकडकर उन्हे बाहर निकलता।

 

दोहा: संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत ।

          चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत ।।

अर्थ: जो सच्चाई के मार्ग पर चलने वाला संत होता है उसे चाहे करोडो ढोगी संत मिल जाये वह अपनी संतई नही छोडता है। वैसे ही जो सज्जन पुरुष होते उन्हे चाहे करोडों दुष्ट पुरुष मिल जाये तब भी वह अपनी सज्जनता नही छोडते है और सच्चाई के मार्ग पर चलते रहते है। जिस प्रकार चंदन के पेड से कही सांप लिपटे होते है फिर भी वह अपनी शीतलता नही छोडता है।

 

दोहा: कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ ।

          जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि मनुष्य का मन पक्षी के समान है। वह जब जहां जाना चाहता है वह उड कर चला जाता है। इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है वो वैसा ही फल पाता है।

 

दोहा: तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई ।

         सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ ।।

अर्थ: बाहरी दिखावे से साधु बनना असान होता है। लोक दिखावे कि लिये भगवा कपडे पहनना तो आसान होता है। लेकिन मन से साधु बनना किसी मन के धनवान व्यक्ति के बस में ही होता है। वह व्यक्ति आसानी से सब सिद्धियो को पा लेता है जो मन से साधु होता है।

 

दोहा: कबीर सो धन संचेए, जो आगे को होय ।

        सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि हमे वो धन जमा कर के रखना चाहिये जो भविश्य में हमारे काम आये। यानि हमे अच्छे कर्म करने चाहिये जो मरने के बाद हमारे साथ जाते है। नही तो आज तक हमने किसी को धन की पोटली बांधकर अपने साथ ले जाते हुये किसी को नही देखा है।

 

दोहा: माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर ।

         आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर ।।

अर्थ: कबीर कहते है कि न हमारा मन मानता है और न माया का लालच खत्म होता है। इसी चक्र में हमारा शरीर न जाने कितनी बार मर गया है लेकिन न ही हमारी आशाओ का अंत हुआ, नाही द्धेष और तृष्णा का । यह सब कबीर दास जी कह गये है।

 

दोहा: मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई ।

          पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई ।।

अर्थ: कबीर कहते है कि मन में उठ रहे लालच को छोड दे ये सब तेरे कहने से नही होगा। यदि पानी से घी निकलने लग जाये तो कोई भी इस संसार में रुखा सुखा नही खायेगा। यानि की बिना मेहनत के अगर सब कुछ मिलने लग जाये तो कोई भी इस संसार में मेहनत नही करेगा।

 

दोहा: हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना ।

        आपस में दोउ लड़ी लड़ी मरे, मरम न जाना कोई ।।

अर्थ: संत कबीर कह रहे है कि हिन्दु कहते है कि हमे राम प्यारा है और मुसलमान कहते है कि हमें अल्लाह प्यारा है। इसी बात को लेकर वो दोनो एक दूसरे से लडकर मर जाते है लेकिन सच को नही पहचान पाते है।

 

दोहा: बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय ।

         जो दिल खोजा आपना मुझसे बुरा न कोय ।।

अर्थ: जब में बुराई को इस संसार में ढुडने चला तो मुझे कोई भी बुरा व्यक्ति नही मिला । लेकिन जब मैने अपने दिल में झाककर देखा तो मुझे इस संसार में अपने से बुरा कोई नही मिला।

Dohe of kabir Das in Hindi with Meaning – कबीर दास के दोहे

दोहा: कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई ।

          बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी.चुनी खाई ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि समुद्र की लहरो में मोती बिखरे हुये आते है। उन्ही मोतीयो का बगुला पहचान नही पाता है और हंस उन्हे चुन चुन कर खाता है।

 

दोहा: जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई ।

         जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई ।।

अर्थ: जब गुणो को परखने वाला सही व्यक्ति मिल जाता है तब गुणो की कीमत लाखो में होती है। और जब गुणो को परखने वाला कोई व्यक्ति नही होता है तो गुणो की कीमत कोडी के भाव जाती है।

 

दोहा: कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस ।

          ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस ।।

अर्थ: कबीर कह रहे है कि है मनुश्य तू स्वयं पर क्या अंहकार करता है। यमराज तेरे बाल पकड रखे है। पता नही वह तुझे घर या परदेश में कब मार डाले।

 

दोहा: पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात ।

         एक दिना छिप जाएगा, ज्यों तारा परभात ।।

अर्थ: मनुष्य का जीवन भी पानी के बुलबुले के समान क्षणभंगुर है। जिस प्रकार सूर्य उदय होते ही तारे कही छिप जाते है वैसे ही एक दिन ये मनुश्य रुपी शरीर मिट जायेगा।

 

दोहा: आछे पाछे दिन पाछे गए, हरी से किया न हेत ।

          अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ।।

अर्थ: आगे पीछे पीछे करते करते सारे दिन बीत गये लेकिन तुमने कभी ईश्वर से मन नही लगाया। जिस प्रकार एक किसान के सारे खेत का अनाज जब चिडिया चुग कर खा जाती है तब पछताकर कोई फायदा नही होता । इसलिये हमे समय रहते सही रास्ते पर आ जाना चाहिये।

 

दोहा: रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।

         हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय ।।

अर्थ: है मनुश्य अपनी राते तुमने सो कर गवा दी और दिन खाने पीने में गवा दिया। यह मनुश्य जन्म जो हीरे के समान अनमोल था। अब यह कोडी के भाव ही जायेगा।

 

दोहा: साईं इतना दीजिये, जा मे कुटुम समाय ।

          मैं भी भूखा न रहूँ साधु ना भूखा जाय ।।

अर्थ: कबीर दास जी ईश्वर से कहते है कि आप मुझे केवल इतना दीजिये कि जिसमे मेरे और मेरे परिवार की गुजर बसर हो जाये। और मेरे घर से कोई भी साधु संत भुखा न जाय।

Dohe of kabir Das in Hindi with Meaning – कबीर दास के दोहे

दोहा: दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करै न कोय ।

          जो सुख में सुमिरन करे, दुःख काहे को होय ।।

अर्थ: सभी लोग दुख में भगवान को अवश्य याद करते है लेकिन अच्छे समय में भगवान को कोई भी याद नही करता। जो व्यक्ति सुख के समय ईश्वर को याद करता है तो फिर दुख किस लिये आयेगा।

 

दोहा: कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी ।

         एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि मर कर क्या करोगो जब जीते जी तुमने भगवान का नाम नही लिया। एक दिन तुम भी पैर लम्बे कर के हमेशा के लिये सौ जाओगे। इसलिये सोकर क्या फायदा जागकर प्रभु का नाम जप कर लो।

 

दोहा: तिनका कबहुँ ना निन्दिये जो पाँवन तर होय ।

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय ।।

अर्थ: कबीर कह रहे है कि हमे अपने पैर पर पडे तिनके की भी निन्दा नही करनी चाहिये। यदि वही छोटा सा तिनका कभी उड कर आंख में चला गया तो बहुत पीडा होगी। यानि कि हमे कभी किसी की भी निन्दा नही करनी चाहिये।

 

दोहा: साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं ।

          धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं ।।

अर्थ: साधू सदैव श्रदा का भूखा होता है वह कभी धन का लालची नही होता है। जो कोई भी साधू धन के लिये मारा मारा फिरता है वह साधू नही है।

 

दोहा: हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास ।

          सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास ।।

अर्थ: कबीर कहते है कि यह हडडी और मांस से बना शरीर अंत में लकडी की तरह और बाल घास की तरह जल जाते है। मानव रुपी शरीर इस तरह जलता देखकर वह काफी उदास हो जाते है।

 

दोहा: जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही ।

          सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही ।।

अर्थ: कबीर दास जी कहते है कि जब मुझमें अंहकार था तब में भगवान को नही देख पाता था। अब जब अंहकार खत्म हो गया है अब केवल भगवान ही भगवान दिखायी पडते है अंहकर नही। जब से गुरु की कृपा से मेरे अंदर ज्ञान का दीपक जला है तब से मेरा सारा अज्ञानता का अंधेरा मिट गया है।

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